यह मामला एक महिला से जुड़ा है, जिसने दुबई में व्यक्तिगत स्थिति संबंधी दावा दायर कर उत्पीड़न के आधार पर तलाक की मांग की, साथ ही दंपति के बच्चे से संबंधित वित्तीय और अभिरक्षा संबंधी दावे भी किए। उसका आरोप था कि पति ने उसे छोड़ दिया, भरण-पोषण नहीं दिया और घर तथा बच्चे की देखभाल का खर्च अकेले उठाने के लिए छोड़ दिया।
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, उसने इससे पहले सूडान और मिस्र में मामले दायर किए थे। हालांकि, उसने दुबई की अदालतों के समक्ष दलील दी कि उन विदेशी कार्यवाहियों के समाप्त होने के बाद भी उत्पीड़न जारी रहा और बढ़ता गया।
यूएई के व्यक्तिगत स्थिति कानून में उत्पीड़न के आधार पर तलाक (जिसे अरबी में दरार कहा जाता है) दोष-आधारित तलाक की एक व्यवस्था है, जो उन मुस्लिम महिलाओं के लिए उपलब्ध है जिन्हें विवाह अनुबंध में एकतरफा तलाक का अधिकार नहीं दिया गया था।
2005 के फेडरल कानून संख्या 28 के तहत, पत्नी अदालत में तलाक की याचिका दायर कर सकती है, यदि वह यह साबित कर दे कि पति के आचरण से ऐसा नुकसान हुआ है जिससे विवाह को जारी रखना असंभव हो गया है। उत्पीड़न की परिभाषा व्यापक है और इसमें परित्याग, भरण-पोषण न देना, मौखिक या शारीरिक दुर्व्यवहार तथा दुर्व्यवहार के अन्य रूप शामिल हैं।
पति ने दावे का विरोध करते हुए तर्क दिया कि इस मामले पर विदेश में पहले ही फैसला हो चुका है और दुबई में इस पर दोबारा मुकदमा नहीं चलना चाहिए।
दुबई की अदालत इससे सहमत नहीं हुई। अदालत ने कहा कि पहले के फैसले उसे मामले की सुनवाई से नहीं रोकते, क्योंकि दावा नए सिरे से हुए और लगातार जारी उत्पीड़न पर आधारित है, न कि केवल उन्हीं तथ्यों पर जिन पर पहले फैसला हो चुका है।
(स्रोत: Khaleej Times)
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