कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण तथ्य और मनगढ़ंत बातों में अंतर करना लगातार कठिन होता जा रहा है। ऐसे में दुबई पुलिस ने चेतावनी दी है कि डीपफेक न केवल गलत सूचना फैलाकर, बल्कि लोगों को असली चीज़ों पर भी संदेह करने के लिए मजबूर करके एक बढ़ता हुआ खतरा बन सकते हैं।
दुबई पुलिस के फ्यूचर फोरसाइट सेंटर के एक नए अध्ययन में बताया गया है कि एआई द्वारा तैयार किए गए यथार्थवादी वीडियो, चित्र और आवाज़ें किस प्रकार डिजिटल सुरक्षा को जटिल बना सकती हैं, ऑनलाइन जानकारी पर भरोसे को कमज़ोर कर सकती हैं और जांच में उपयोग होने वाले सबूतों के सत्यापन को कठिन बना सकती हैं।
अध्ययन चेतावनी देता है कि चुनौती जल्द ही नकली सामग्री की पहचान से आगे बढ़कर यह साबित करने तक पहुंच सकती है कि असली तस्वीरों, वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग में हेरफेर नहीं किया गया है।
दुबई पुलिस के फ्यूचर फोरसाइट सेंटर के निदेशक ब्रिगेडियर डॉ. हमदान अहमद हमदान अल गस्सिया ने कहा कि जनरेटिव एआई में प्रगति के कारण मानव चेहरों और आवाज़ों की नकल करना और विश्वसनीय दिखने वाले वीडियो व ऑडियो रिकॉर्डिंग तैयार करना आसान होता जा रहा है।
इन क्षमताओं का दुरुपयोग पहचान की चोरी, प्रतिरूपण, धोखाधड़ी और भ्रामक जानकारी के जानबूझकर प्रसार के लिए किया जा सकता है, जिससे व्यक्तियों, व्यवसायों और सुरक्षा अधिकारियों के लिए जोखिम पैदा होते हैं।
इसके परिणाम उन जांचों और महत्वपूर्ण निर्णयों तक भी पहुंच सकते हैं जो डिजिटल सबूतों पर निर्भर करते हैं। जैसे-जैसे हेरफेर की गई सामग्री अधिक परिष्कृत होती जाएगी, किसी रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता की पुष्टि करना और कठिन हो सकता है।
(स्रोत: Khaleej Times)
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